मूल 'जड़' है — स्वामी केतु, देवता निर्ऋति। यह हर बात की जड़ तक खोदने वाला नक्षत्र है — सतह चीरकर सत्य तक। जातक अन्वेषी, दार्शनिक और तीव्र होते हैं; हर विषय की तह तक जाना इनकी प्रकृति है। जीवन में प्रायः उखड़ना-उजड़ना और फिर गहरी नींव पर पुनर्निर्माण चलता है।
मूल 'जड़' है — स्वामी केतु, देवता निर्ऋति। यह हर बात की जड़ तक खोदने वाला नक्षत्र है — सतह चीरकर सत्य तक। जातक अन्वेषी, दार्शनिक और तीव्र होते हैं; हर विषय की तह तक जाना इनकी प्रकृति है। जीवन में प्रायः उखड़ना-उजड़ना और फिर गहरी नींव पर पुनर्निर्माण चलता है।
शोध व अन्वेषण, दर्शन और अध्यात्म, चिकित्सा (विशेषतः मूल-औषधि), मनोविज्ञान और रूपांतरण-कार्य — जो तोड़कर नया रचें।
प्रेम में सतही सुख नहीं, गहराई और सत्य चाहिए। रिश्ते उथल-पुथल से गुज़र सकते हैं; सच्चाई और आध्यात्मिक रुचि वाले साथी के संग गहन, रूपांतरकारी बंधन बनता है।
सत्य की जड़ तक पहुँच; दार्शनिक गहराई; शून्य से पुनर्निर्माण का साहस।
विध्वंस और उथल-पुथल; बेचैनी और चरम-वृत्ति; रूखा स्पष्टवाद।
निर्ऋति/माँ काली-दुर्गा की उपासना और केतु की शांति; रचनात्मक समापन स्वीकारें, स्वाध्याय को साधना बनाएँ।
विंशोत्तरी दशा प्रणाली में मूल नक्षत्र का स्वामी केतु है।
मूल नक्षत्र धनु 0°–13°20′ में विस्तृत है। इसका गण राक्षस, नाड़ी वात और योनि श्वान है।
मूल के चार पादों के नामाक्षर हैं: Ye, Yo, Bha, Bhi।
निर्ऋति/माँ काली-दुर्गा की उपासना और केतु की शांति; रचनात्मक समापन स्वीकारें, स्वाध्याय को साधना बनाएँ।